تویل افسانہ ؛ میں دریا دریا /ڈر.رنجن زیدی तवील अफ़साना दिल दरिया- दरिया / डा० रंजन जैदी
तवील अफ़साना
दिल दरिया-दरिया
डॉ रंजन जैदी
आज शराफत यार खान का दिन पुराने जमाने के कुछ पुराने मुहावरों की तरह बेहद मनहूस रहा था। देश भर में कोविड के लॉकडाउन की घोषणा की जा चुकी थी। नई खबर थी कि ट्रेनों का भी चक्का जाम होने वाला है। अब पता नहीं कि यह फैलाई गई अफवाह थी या सचमुच कोई सरकारी विज्ञप्ति थी। ऐसी खबरों के बीच शराफत यार ख़ान को अपनी माँ और मौसियों का खयाल आ गया। इस समय दोनों ही लखनऊ में रह रही थीं ।
इन्हीं उधेड़बुन में शराफत यार खान को अचानक उस एक अजनबी लड़की का भी खयाल आ गया जो पिछली दो रातों से पहले घर लौटते समय उनसे प्लेटफ़ॉर्म के बाहर मिली थी और बिना टिकेट के सफर करती रही थी। उन्होंने तुरंत माता माई को फोन किया, उसके आदमियों से भी संपर्क किया, बताया कि उन्होंने किसी लड़की को उसके पास भेजा था, लेकिन जवाब तो आश्चर्य-चकित कर देने वाला था। वह तो ढाबे तक पहुंची ही नहीं। कहाँ है वह?
शराफत यार खान के हाथों से तोते उड़ गए। वह हड़बड़ाकर इधर-उधर फोन खटखटाने लगे, घर के नौकर बंदे हसन को सब तरफ दौड़ा दिया, खुद भी प्लेटफ़ॉर्म के अंतिम सिरे तक जहां बेंच पर मुसाफिर आकार बैठते थे, देख आए। खुद खान ने रिटायरिंग-रूम में जाकर पता किया, अटेंडेंट ने जरूर बताया कि वह दो रातों तक तो यहां रुकी थी, फिर किसी वृद्ध महिला के साथ वह कहीं चली गई। खोजबीन की दृष्टि से अटेंडेंट ने रजिस्टर के पन्ने पलटकर उस अज्ञात महिला का नाम, पता और टिकट नंबर नोटकर ख़ान को दिए और ख़ान ने रेटायरिंग से बाहर निकलकर बंदे हसन को दिए और हिदायत दी कि बिना समय गँवाए वह तलाशकर उन्हें रिपोर्ट करे।
इस नए संपर्क-सूचना ने शराफत यार ख़ान को फिक्र में डाल दिया था। पता नहीं वह महिला कौन थी, ठीक भी थी या नहीं। जब तक पता नहीं चलेगा, फिक्र तो होगी ही। लड़की के पास टिकट भी नहीं था। मतलब साफ़ है कि उसके हालात सामान्य नहीं थे। वह कुछ बताना भी चाहती थी, लेकिन मैंने सुना ही नहीं, यह तो कोई बात नहीं हुई, मुझे सुनना चाहिए था। अम्मी जब यह सारी बातें सुनेंगीं तो कितनी डांट पड़ेगी। इस तकलीफ़ में भी ख़ान को फीकी सी हंसी आ गई।
इसलिए अजनबी लड़की का डर समझ में आता है। शायद उसकी मदद करते हुए लाइनमैन बहुआ बेहरा को भी डर लगा होगा। ज़माना भी तो बहुत खराब है । हालांकि लोगों की बातों से पता चलता है कि लाइनमैन से उसकी कुछ बातें हुई थीं, शायद वही कुछ बता सके लेकिन फिर वह भी तो दिखाई नहीं दे रहा है। तीन रातें हो रही हैं, तीन रातें...? कहाँ चली गई वह...? कितनी बड़ी ग़लती हो गई। वह कुछ खान से कहना चाह रही थी। उन्होंने क्यों उसकी बात नहीं सुनी, उफ़…कहीं ग़लत हाथों में न पड़ गई हो। वह रेलवे पुलिस से भी संपर्क नहीं कर सकते हैं। कहीं कोई मामला खुद उनके अपने गले न पड़ जाए। इस विषय पर बहुत सावधानी बरतनी होगी। शायद मैं कुछ ज़्यादा ही उत्सुकता दिखा रहा हूँ। मुझे अब अधिक खोजबीन में रुचि नहीं लेनी चाहिए
स्टेशन पर मारी-मारी जैसा हाल था। कोरोना के भय ने सबको डरा दिया था। ट्रेनें न केवल लेट थीं बल्कि बहुत सी कैंसिल भी होती जा रही थीं। यात्रियों का जमगठा बढ़ता जा रहा था। उधर, बंदे हसन खाली हाथ नहीं लौटा था। उसने जो खबर दी उससे शराफत यार ख़ान के पैरों के नीचे से जमीन खींच ली थी। खबर के अनुसार ‘सहर’, यानि वह अजनबी लड़की जिसने शराफत यार खान की नींदें हराम कर दी थीं, वह इस समय सीतापुर के ही कस्बा मछरेठा में स्थित स्वर्गीय मौलवी अहमदुल्लाह शाह के टीले वाली हवेली में सकुशल मौजूद है और खुश है।
यूं तो यह हवेली इतिहास पुरुष एक स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिकारी मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने अपने जीवनकाल में बनवाई थी लेकिन उन्हें इसमें रहना कभी नसीब नहीं हुआ और वह 1857 के विप्लव के जमाने में ही 16 अप्रैल, 1857 को शहीद हो गए। स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक क्रांतिकारियों के साथ उनकी यह लड़ाई सिधौली, (सीतापुर) के कस्बा बाड़ी के करीब तत्कालीन ब्रिटिश हमलावर सेना की एक टुकड़ी के साथ हुई थी। तब घाघरा नदी तक सैनिक क्रांतिकारियों का पूरा कब्जा था। इस युद्ध में राजा लोन सिंह, फिरोज शाह और बख्शी हरी प्रसाद सिंह भी शहीद हुए थे।
यह युद्ध फैलते हुए खैराबाद तक जा पहुँचा था जहां अंग्रेज़ी सेना के ब्रिगेडियर जनरल बाकर के लिए नई कुमुक पहुंची तो देशी क्रांतिकारियों के हौसले पस्त होने लगे लेकिन फिर उन्हें भी राजा हरी प्रसाद सिंह, लोन सिंह और ख़ान बहादुर ख़ान के दस हजार घुड़-सवार, पैदल फौज और दस हजार पैदल सैनिकों की कुमुक मिल गई और जंग का नक्शा बदल गया लेकिन कुछ कायस्थ वारियरों और इलाकाई जमींदारों के धोखा देने के कारण राजा हरी प्रसाद के आदेश पर याक़ूब ख़ान, लक्कड़ शाह और घुममन सिंह के साथ खैराबाद में फिर युद्ध जीतने का प्रयास किया लेकिन मछरेठा में अंततः स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए। बिसवा में फिरोज शाह भी अपने 15 सैनिकों के साथ घाघरा पार करते हुए शहीद हो गये और राजा हरी प्रसाद बेगम हज़रत महल के साथ नेपाल की तरफ चला गया।
बिना समय गंवाए शराफ़त यार खान ने अलीगढ़ से अपने कज़िन (मौसेरे भाई) असलम ख़ान से वाट्सऐप पर बातें करते हुए सिधौली पहुँचने का तुरंत अनुरोध किया और तदुपरांत असलम ने भी इसे बड़े भाई का आदेश मानकर कुछ ही समय में अपना किट लेकर बाईक पर सवार हो गया, लेकिन रास्ते भर दिल में एक ही संदेह कुलबुलाता रहा कि शहरयार भाई को ऐसी क्या इमरजेंसी आ गई...कि वाट्सऐप पर भी नहीं बताया, बस कह दिया, ‘आ जाओ!’ असलम ने भी चलने से पहले संदेश प्रेषित कर दिया…, ठीक है, आ रिया हूँ भाई......।’
सब तरफ अंधेरा था। पावर-स्टेशन का कोई बड़ा ब्रेक-थ्रो हो सकता है, लेकिन रेलवे कालोनी का तो अपना जेनरेटर भी है। शायद कोई और तकनीकी मामला हो सकता है। व्यवस्था के सौ लफड़े होते हैं। लाइट तो आ ही जाएगी। पहले वह आँगन में चहलकदमी करते रहे, घुप अंधेरा। बस, आकाश पर तारों का जाल फैला हुआ था। आँगन में अनार के दरख्त पर कोई परिंदा फड़फड़ा कर कानों के पास से गुजरकर अँधेरों में ग़ायब हो गया। एक बिल्ली की आंखेँ चमकीं फिर मियाऊँ की आवाज आई। वह कूदकर अमरूद के दरख्त पर पहुंची और सन्नाटे में किसी परिंदे की चीखें कानों के परदों को चीरने लगीं लेकिन फिर एकाएक सन्नाटा छा गया। शराफत यार ख़ान की घबराहट और बढ़ गई।
ग्राउन्ड-फ्लोर के अपने एल-शेप कुआर्टर के पीछे की खिड़की के उस पार से गुजरने वाला ट्रैफिक भी इस समय कुछ कम हो चुका था। गाड़ियों की रोशनियों से अंधेरे ह्यूले थरथराने लगे थे। शराफत यार ख़ान एमर्जेंसी लाइट ऑन कर सड़क से लगी खिड़की की ही तरफ आकर खड़े हो गए। सामने नौ फुट की चौड़ाई वाली सड़क पर अभी भी इक्का-दुक्का गाड़ियां आ जा रही थीं। उससे टिककर वह सामने देखने लगे लेकिन उनका ध्यान अपने भाई असलम की ही तरफ था कि अब असलम शाहजहांपुर से आगे बाईपास से निकल गया होगा। उसे बहुत तेज बाइक नहीं चलानी चाहिए। अल्लाह उसे साथ खैरियत के यहाँ तक ले आए।
इसी समय छज्जे से अंधेरे में ही नुमाइरा की आवाज़ सुनाई देती है।’ “भाई जान, खाला नहीं आईं?”
“क्यों? आने वाली हैं क्या?” शराफ़त यार ख़ान चौंक गए।
“आपकी नाक पर तो अंधेरे में भी मक्खी बैठी रहती है।’ नुमाइरा एकदम खिलखिलाकर हंस पड़ी,” इकदम बारिश के भीगे पौधे की तरह जड़ों से उखड़ जाते हैं भाईजान? एक बात बताएं, आप जब पैदा हुए थे तब आपने बिना सांस लिए दाई से कितने थप्पड़ खाए थे?”
“बदतमीज़! घर में कोई बड़ा नहीं है क्या?”
“छोटा भी नहीं है। रात भर लाइट नहीं आई तो मैं कैसे रहूंगी। अकेले में मुझे बहुत डर लगता है। आप भी वहीं आ जाइए, साथ ही खाना खाएंगे। मेरे घर के सब लोग तो चालीसवें में अलादातपुर फुप्पो के यहां गए हुए हैं। सुना है, कोई कह रहा था, असलम भाई ने एएमयू में दाखिला ले लिया है। यह खबर सुनकर मैं तो बहुत ही खुश हो गई हूँ।”
“क्यों, इस खुशी का मतलब...कोई नई रेटिंग है? ”
“हाय अल्लाह, आप कैसे हैं भाई जान, खाला आयेंगी तो पूछूँगी कि पहली पान की पीक आपके मुंह में किसने डाली थी, किसी शादीशुदा बाजी ने या कुँवारी बिब्बो ने? कसम से भाईजान, शुक्र मनाइए कि मैंने आपकी रैगिंग नहीं की, लेकिन असलम भाई की रैगिंग मैं जरूर करूंगी।”
इसी समय लाईट आ गई, इसका शोर भी सुनाई देने लगा, शराफ़त यार ख़ान ने निगाह ऊपर उठाई तो देखा, खिड़की की चौखट से चिपकी कौसर अंसारी कमर तक नीचे लटकी हुई थी। वह लगातार हँसे जा रही थी,”भाईजान, आज मैंने पाए बनाए थे। मैं पाए बहुत अच्छे बनाती हूँ, कसम से। लेकर आऊं?, दुत्कारेंगे तो नहीं?’
शराफत यार ख़ान कौसर अंसारी की शरारत पर हँसकर कमरे में लौट आए और मुसकुराते हुए एमर्जेंसी लाइट आफ़ कर दी। माँ के फोन का नंबर डायल किया और जब उन्होंने जवाब में अजनबी आवाजें सुनीं तो पूछा,’आप ...! लखनऊ में नहीं हैं क्या... ? कहाँ हैं?”
“नहीं! मैं मछरेठा में हूँ, आपकी चहीती खाला नवाबज़ादी बेगम शदाना की हवेली में। आज यहाँ ‘ब्लॉक वुमन-चेतना-मंच’ की तरफ से सीएए और एनआरसी को लेकर ब्लॉक-समिति की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी, उसमें शामिल होने के लिए लखनऊ से मैं भी आ गई हुई थी। एक राज़ की बात बताऊँ... बेटा? यहाँ मैंने आपके लिए एक खूबसूरत लड़की देखी है, सुभान अल्लाह! क्या हुस्न-ए-जमाल है, क्या शोला-बयानी। बस! अब आगे इंतजार नहीं। आपकी मुंह बोली खाला यानि हमारी बेगम शदाना बाजी को भी वह बहुत पसंद आई है। हमें अल्लाह पर भरोसा है, बेगम बाजी की पसंद आप दोनों भाइयों को भी पसंद आएगी, इंशाल्लाह!”
“आप...आप... आप क्या कह रही हैं मम्मी? हम नहीं समझे! हमें पता करना था कि एक लड़की, उसका नाम सहर आशोब है, वह खाला बेगम के घर पर ही है। आप जब आएं तो उसे अपने साथ जरूर लेते आइएगा। उसका यहाँ आना ज़रूरी ही नहीं, बहुत जरूरी है। वैसे भी आप लखनऊ तो जाएंगी नहीं, इधर ही आ जाइए। बंदे हसन, असलम के साथ गाड़ी लेकर सुबह यहाँ से रवाना हो जाएंगे। कोरोना का जोर बढ़ रहा है, बहुत केयर करने की जरूरत है। आप अपना ख्याल रखिएगा।”
घंटी बजी तो बंदे हसन ने जाकर बाहर पहले तो लड़की को ऊपर से नीचे तक देखा, सकुचाए, फिर पूछा, “घर में माँ जी नहीं हैं! कल-परसों आएंगी। साहब अपनी स्टडी में हैं। चाय के लिए दूध अगर खत्म हो गया हो तो बताएं बीबी, चाहिए क्या? आप यहीं रुकें, मैं लेकर आता हूँ।’ इसके साथ ही दरवाजे के दोनों पट खोल दिए गए। दरवाजे के बीचो-बीच कौसर अंसारी दोनों हाथों पर शीशे के मर्तबान में कुछ लिए हुए खड़ी दिखाई दी। उसने बड़बड़ाते हुए कहा,”इस घर का तो आवे का आवा ही बिगड़ा हुआ है। अजीब बत्त्तमीज़ लोग हैं।’
बंदे हसन की उपेक्षा करते हुए कौसर अंसारी ने रसोई में खुद जाकर मर्तबान रख दिया। जब वह जाने के लिए मुड़ी तो उसने हँसते हुए पूछा, ‘आप साहब को जाकर इत्तिला देंगे या मैं ही उनके कमरे में जाकर इत्तिला दूँ कि इस मर्तबान में लज़ीज़ पाए हैं।’ दांत पीसते हुए वह शहरयार ख़ान को नजर गड़ाकर देखने लगी। कुछ क्षणोपरांत शहरयार ने कहा, “पाए में लाल मिर्चें तो डाली ही होंगीं। फिर भी आपके बनाए हुए पाए हम जरूर खाएंगे और असलम मियां भी। हो सकता है, वह आने ही वाले हों। हाँ! बंदे हसन भाई, आप जाकर ढाबे से दस-15 रोटियाँ लेते आइए, हमें अब भूख लग रही है।”
” “पाए मेरे नहीं भाईजान, बकरे के हैं।” कौसर ने ग़लती सुधारते हुए जवाब दिया।
लेकिन ठीक इसी समय मालूम हुआ कि बाहर आड़ू के बाग में शोर मचाती हुई असलम की बाईक का शोर कुछ लम्हों तक गूंजते रहने के बाद धुआँ फैलाकर शांत हो जाता है लेकिन दीवानगी में “ सांलेकुम असलम भाई !” कहती हुई कौसर बग़ल की सीढ़ियों पर चढ़ती हुई खनखनाती हंसी के साथ एकाएक ग़ायब हो जाती है।
कौसर अंसारी के इस ‘सांलेकुम’ ने असलम को एक ही सांस में न केवल आश्चर्यचकित कर दिया था, बल्कि एक महीन मुस्कान से उनकी मुलाकात भी करा दी थी, ”मोटी!”
उस रात शायद कोई नहीं सोया था, न इधर शराफत यार ख़ान और न उधर असलम ख़ान। शराफत यार ख़ान ‘सहर’ को देखने के लिए लगातार बेचैन होते जा रहे थे और नींद कोसों दूर होती जा रही थी। उनकी ज़िंदगी में ऐसे लम्हे पहले काभी नहीं आए थे। कभी उन्हें किसी लड़की ने अपनी तरफ आकर्षित नहीं किया था। सब कहते थे, शराफ़त की ज़िंदगी में औरत है ही नहीं। शादी की लकीर पर सांप बैठ गया है। वह इंसान नहीं, एक देवमालाई महाकाती किताब है जिसमें देव हैं, दानव हैं, राक्षस हैं और बदसूरत कुटनियाँ हैं। परियाँ तो शाराफ़त यार ख़ान के पास से होकर गुजर जाती हैं, देखती ही नहीं।
एक बार स्टेशन पर एक लड़की ने पूछा, “मेरे साथ डेटिंग करेंगे?” चौंककर शराफत यार ख़ान ने झिझकते हुए पूछा, “क्यों?” लड़की ने जवाब दिया, “यूं ही, आप मुझे अच्छे लगे, मैं कर्नल मैक मोहन सरीन की बेटी हूँ। हॉर्स-राइडिंग मेरा पैशन है। नौजवान मेरे साथ डेटिंग के सपने देखते हैं लेकिन मैं आपको इनवाईट कर रही हूँ। यह मेरा पैशन है.... ”
यहाँ पर शराफ़त खान एकाएक सकपका गए। उन्होंने लड़की को तो जवाब नहीं दिया, उलटे टिकट जरूर मांग लिया। लड़की का चेहरा इतना सुनते ही लाल हो गया, उसने अपने बाडीगार्ड को आवाज दी, ’साहब को मेरा आईडी चेक करा दो ....” इतना कहकर वह तीर की तरह स्टेशन से बाहर निकल गई। उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा बल्कि एयर-फोर्स की सी ड्रेस पहने ड्राइवर के साथ एक बेशकीमती कार में जाकर बैठ गईऔरड्राइवरसेदहाड़करबोलीकहा,ब्लडी-बास्टर्ड.......।” ”” ?“ ”
असलम ने करवट लेकर भाई को देखा, वह जग रहे थे। माथा छुआ, तप रहा था। सोचा, कहीं कोविड का असर तो नहीं हो रहा है। भाई सोये भी नहीं हैं। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा,“पानी दूँ भाई?” लेकिन भाई को शायद नींद आ गई थी। असलम ने अंगड़ाई ली और वरांडे में निकल आया। वरांडे में गमले फूलों से भरे हुए थे, आधी रात की महक रगों में बहने लगी थी। अनार के पेड़ पर कई अनार ग़िलाफ़ से ढके हुए थे। शायद पूर्णिमा के कारण चंद्रमा पूरे आकाश को अपने प्रकाश से दमका रहा था, खुशबू और रोशनी ने अजीब सी जादुई ठंडक उसके जिस्म की रगों में पहुँच दी थी। असलम अकारण आँगन में टहलने लगा, उसकी आँखों से नीद ग़ायब हो चुकी थी। रास्ते की थकन अभी भी जिस्म में बाकी थी। शायद वह सो भी जाता लेकिन कौसर की दिलफ़रेब मुस्कुराहट ने उसे अजाने में कहीं बेचैन कर दिया था। नल से टिककर आकाश को देखने लगा। इतनी रात आँगन में पूरे चाँद के नीचे उसकी दूधिया चाँदनी में वह रोमांच से भरता जा रहा था।
ढाई बज रहे थे, आँगन में खुलने वाली ऊपरी मंजिल की खिड़की से असलम को एक चेहरा झाँकता हुआ महसूस हुआ। उसके समूचे जिस्म में इस चेहरे से एकाएक सिहरन सी दौड़ जाती है। “भूत.. ”..! असलम डरकर भागने को हुआ कि कौसर खिड़की से आधी नीचे लटक सी जाती है। उसने फुसफुसाते हुए धीरे से कहा,“ज़ीने का दरवाजा मैंने खोल दिया है, आज मेरे यहाँ कोई नहीं है। आ जाओ......चुपचाप, बहुत सी बातें करेंगे!”
असलम का गला खुश्क हो गया था। उसे प्यास लग ने लगी थी लेकिन वह अपने पसीने को भी खुश्क नहीं कर पा रहा था । एकाएक एक द्वंद्व युद्ध छिड़ गया था। क्या करून भाई ? पता नहीं क्या हो गया है मुझे? कहीं कुछ ग़लत तो नही होने वाला है? शाहिद के साथ भी तो एक रात एक लड़की उसके कमरे में रुक गई थी, फिर वह आती रही, फिर उसने उससे शादी कर ली। लेकिन कौसर से वह शादी तक की बात नहीं सोच सकता। अभी तो वह खुद छोटा है।”
लेकिन कौसर ने दबे पांव नीचे उतरकर पूरी हिम्मत के साथ दरवाजे में ताला लगाया और असलम को लेकर ऊपर अपने घर आ गई और पूरी सतर्कता से ऊपर अपने कमरे के दरवाजे बंद कर लिए। बाहर सड़क के कुत्तों के भौंकने की शुरुआत हो गई थी। कहीं करीब से गार्ड की व्हिसिल भी सुनाई दी, शायद गार्ड को कुछ संदेह हुआ था, वह शहरयार के क्वार्टर के पास आकर ऊपर टार्च की रोशनी फेंकी लेकिन कहीं कुछ दिखाई नहीं दिया। अंततः कुत्तों का भौंकना भी बंद हो गया।
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(कहानी अब एक नए मोड़ पर पहुँचने वाली है। नागरिकता संशोधन कानून के लागू हो जाने के बाद देश की महिलाएं अपने अधिकार की लड़ाई किस तरह के आंदोलनों के माध्यम से लड़ना चाहती हैं,और लड़ेंगी; पढ़िए कहानी की अगली कड़ी में... )
تویل افسانہ ؛ میں دریا دریا /ڈر.رنجن زیدی
(دوسری قسط)
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اسکی زندگی کا ماضی پھر لوٹ آیا تھا- وہی لڑکی، ویسی ہی ٹرین اور ویسی ہی اسکی دہشت سے بھری خوفناک آواز، دل کو چیرتی ہوئ گونج- وہی پرانا سا احساس کہ جب ٹرین گزرے تو جسم میں لغزش اور ارتعاش پیدہ ہو جائے-ٹرین کا جھونکا اسے پلیٹفورم پر اوندھے منہ گرا گیا تھا-اس ہونے والے حادثے کی ٹیسیں آج بھی تازہ تھیں-جانے کتنی دیرتک وہ پلیٹفورم کے آوٹرپر نیم بیہوشی میں پڑی رہی تھی- رفتہ رفتہ نیم بیہوشی ہوش میں تبدیل ہونے لگی-اس نے پلکیں جھپکائیں، محسوس ہوا کہ وہ اب بھی زندہ ہے- کوئی شخص اسے ہلا ڈلا رہا ہے- وہ کسمسائی، اٹھنے کی کوشش کی-سگنل کی تیز سرخ تابناک روشنی اندھیرے میں بھی خوف کا سامان بنی ہویی تھی- تبھی اسے لمبے چھرہرے قد-کاٹھی کا ایک سایہ دکھائی دیا جسنے اسے اٹھاکرسیمینٹ کے ایک پیلرکے سہارے بٹھایا اورپوچھا،"کون ہو تم؟" -نیم سرد ہوا کے ایک جھونکے نے زخمی لڑکی کے بدن کو چھوا تو درد سے وہ تڈپ اٹھی- وہ کراہی تو نوجوان بیچین ہو گیا- درد بڑھتا جا رہا تھآ-
چھرہرے بدن والے شخص نےچاروں طرف دیکھا، دور لالٹین لئے کچھ کامگارآتے دکھای دیے- نوجوان خوفزدہ ہو گیا - کہیں وہ کسی بڑے خطرے کا شکارتو نہیں ہو جاےگا؟ وہ سکپکا گیا تھا تب، لیکن وہ پھر بھی ہارا نہیں- لڑکی نے تھرتھراتی-کانپٹی نگاہوں سےنوجوان کو اڑتی نگاہ سے دیکھا اور پھر گردن جھکا لی- لیکن لڑکے کو لڑکی پر بہت غصّہ آ رہا تھا، "مرنے کے لئے آئی تھیں؟" اسی نوجوان نے اسے پھر سہارا دیکراٹھایا- لڑکی کا جسم کانپ رہا تھا- نوجوان نے کہا-"میرا کوٹ بدن پر ڈال لو، سردی سے -تمہارے دانت بج رہے ہیں- دھیرے دھیرے چلنے کی کوشش کرو-ڈرو مت- میرے ساتھ ساتھ چلو، ادھر ریلوے ٹریک کے پاس سے سپر فاسٹ ٹرینیں گزرتی ہیں-یہاں تنہا کھڑے ہونا بھی ٹھیک نہیں ہے-پاس میں ہی چرسیے یعانی ڈرگ اییکٹ نشیڑیےچکّر لگاتے رہتے ہیں- گشتی پولیس کی ٹکڑی کسی بھی وقت ادھر سے گزرتے ہوے نامعقول سے سوالات کر سکتی ہے- ہو سکتا ہے ہمیں گرفتاربھی کر لے، رات کا وقت ہے، تمہیں اپنے ساتھ لے جائے اور.....تم میرے ساتھ چلو-ایسے میں مین تمہیں تنہا نہیں چھوڈ سکتا- پاس میں ہی میرا سرکاری کواٹررہے، وہیں-----!"
اپنی کوشش کو بروے کار لاکر آخر کار لڑکی کو جائے وقوع سے ہٹاکر وہ ریلوے کولونی کے نزدیک تک پہونچنے میں کامیاب ہو گیا-پھلدار درختوں سے بھرے باغ کے بیچ ١٥ کوارٹروں کی ہائی وال سے گھری ایک سرکاری کولونی تھی-میں گیٹ پر کوکیدار کی ڈیوٹی یوں تو ٢٤ گھنٹے کی تھی لیکن دونوں چوکیدار زیادہ تر اسٹیشن ماسٹر کی خدمات میں مسروف رہتے تھے-کتوں کی ایک ٹولی ضرور باغ میں بکھری رہتی تھی-اسے فایدہ یہ تھا کہ اسمیکیے بآڑ لآنگھ کراندر کے گھروں کے تا لے نہیں توڈ پاتےتھے- اسلئے چوری چکاری بھی نہیں ہو پاتی تھی-
نوجوان سبکی نظروں سے بچتے بچاتے تالا کھولکر آخکارلڑکی کے ساتھ اپنے کوارٹرمیں داخل ہو گیا- اب بنفس نفیس وہ خطرے سے باہر تھا لیکن مشکلیں ابھی بھی موجود تھیں-کہیں کوئی دروازہ نہ کھٹکھٹا دے- کسی نے بڑے صاحب کو خبر نہ دے دی ہو- مخبری نہ کر ہو! کسی بھی طرف سے ریلوے پولس کا گشتی دستہ ادھر نہ آ جاے... کولونی کے گیٹ پر اسے کسی نے دیکھ نہ لیا ہو! ذرا سی چووک اسکی نوکری کو کھا سکتی ہے- پتہ نہیں یہ لڑکی کہان سے چل کرادھر آ پہنچی ہے- یا علی مدد، یا الله رحم کر-خوفناک اندہیرے میں روشنی کے چراغ منوور کر-سیشم کے درخت پر اوللو پھڑپھڑایا رو لڑکی ڈرکرنوجوان سے لپٹ گی- "ہائے اللہ، یہ کیسا ڈراونا علاقہ ہائی...."
"ابھی تالے کھولتا ہوں-شکر ہے ، کتے نہیں بھونکے ورنہ...گھروں سے ٹی وی چلنے کی آوازیں آنے لگی تھے-مہابھارت سیریل کے آنے سے ویسے بھی سب دروازہ بینڈ ہو جاتے ہیں- لیکن روشنی چھن چھن کر باہرنکل رہی تھی-گھر میں آنے کے بعد ان باہر جیسا خوف نہیں تھا-البتہ کتے ضرور بھونکنے لگ جاتے تھے- سوئچ آن ہوتے ہی سب طرف روشنی ہی روشنی بکھر گی تھی - جب نوجوان نے پہلی بار غور سے لڑکی کو ورانڈے میں دیکھا تو نگاہ اس کے چہرے پر اٹک کر رہ گی- ایسا کمسن حسن دیکھ کر بھلا کون خاموش رہ سکتا تھا- سبحان الله!
لڑکی نے بھی تھرتھراتی-کانپتی نگاہوں سے نوجوان کو نگاہ بھر کر دیکھا اور پھر گردن جھکا لی- اچانک دبی دبی آواز میں لڑکے کو لڑکی پر بہت غصّہ آتا محسوس ہوا-."مرنےآئی تھیں؟ کتنی بزدل ہو! کہیں ایسے ھار ما نی جاتی ہے-کربلا کا واقعہ یادنہیں کیا؟ کر لیتیں-لیکن مجھے تو یہ بھی نہیں معلوم ہے کہ تم ہندو ہو یا مسلمان....کوئی ہو، رام نے بھی قربانی دی تھی- روڈ سے لدے تھے- میتھ ہوتے ہوے بھی اسمیں میسسیج ہے...اسلام میں پیغمبروں نے قربانیاں دی تھیں- ہر دور کے پروفٹس نے قربانیاں دی تھیں ... انھوں نے بھیمصیبتیں سہی تھیں-انھیں کی ہی وجہ سے آج دنیا میں اسلام زندہ ہے-اورادرشواد بھی لیکن تم....؟"
" میں بہت ڈر گی تھی صاب جی-" لڑکی نے کانپتی ہوئی آواز میں کہا، "زندگی کے سارے سرے الجھ گئے تھے- ھر طرف اندھیرا تھا- میں کیا کرتی؟' وہ بھربھراکر رو پڑی- آپنے مجھے کیوں بچا لیا، مر جانے دیا ہوتا-"
"ممممیں نے یہ تو نہیں کہا تھا کہ تم رونے لگ جاؤ- جاؤ، پہلے فریش ہو جاؤ! سامنے
کمرہ ہے-اسمیں باتھروم اٹیچ ہے- زور سے مت بولنا- مین چاے بناتا ہوں-پتہ نہیں کب سےبہوکھی ہوگی-پہلے کچھ کھا پی لینا- تم میرے کپڑے پہن سکتی ہو، کل دیکھیںگے-"
"اب جاکر چپ چاپ سو جاو، لیکن پہلے کچھ کھا پی لینا-- پتہ نہیں کب سےبہوکھی ہوگی- الماری میں برڈ، شہد اور بٹرفرج میں رکھا ہوگا، دل کرے تو کھا لینا- آرام سے بعد میں سسونا، چے بناکر لا رہا ہوں- باتیں صبح کرینگے- ."
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